हम महिला दिवस मनाते हुये उन सख़्त धार्मिक और सामाजिक रूप से क्रूर रिवाजों के नीचे दबे हैं जो पितृसत्ता की पोषक और स्त्री की शोषक हैं. कितने सारे अंधविश्वास, पाखंड और कर्मकांड महिलाओं ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने ऊपर लाद लिये हैं.
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