शहर में हमारे घर आंगन एक दूसरे से इतने अलग और बंटे हुए हैं कि कब वहां सुख और दुख 'हमारे' ना होकर 'मेरे और तुम्हारे' में बदल जाते हैं, हम नहीं समझ पाते.
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